India Private Sector Overwork Crisis: देश में महंगाई भले ही आंकड़ों में काबू में दिख रही हो, लेकिन आम आदमी की जेब पर इसका दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कम सैलरी में घर का खर्च पूरा न होने की वजह से लाखों प्राइवेट नौकरी करने वाले कर्मचारी रोज 16 से 18 घंटे तक काम करने को मजबूर हैं। सुकून से सोना और परिवार को समय देना अब इन कर्मचारियों के लिए किसी सपने जैसा हो गया है। सवाल यह है कि आखिर इस व्यवस्था को सुधारेगा कौन?
महंगाई की मार, घटती जेब – India Private Sector Overwork Crisis की जड़
हाल के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई दर करीब 3.48 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि ऊर्जा और ईंधन की लागत में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भले ही यह आंकड़ा किताबी तौर पर नियंत्रण में लगे, लेकिन रसोई के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और घर के किराए में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने आम मध्यम वर्गीय परिवार का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। ऐसे में एक अकेली सैलरी से घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है, और कर्मचारी अतिरिक्त कमाई के लिए ओवरटाइम करने को मजबूर हो रहे हैं।
16-18 घंटे काम करने को मजबूर कर्मचारी
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 51 प्रतिशत कर्मचारी हफ्ते में 49 घंटे से भी ज्यादा काम करते हैं। कई प्राइवेट कंपनियों में हालात इससे भी बदतर हैं, जहां कर्मचारियों को रोजाना 16 से 18 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। ज्यादातर मामलों में यह ओवरटाइम मजबूरी में होता है – या तो टारगेट पूरा करने का दबाव होता है, या फिर कम सैलरी की भरपाई के लिए एक्स्ट्रा घंटे काम करना पड़ता है।
टेलीकॉम सेक्टर में हालात सबसे ज्यादा गंभीर
टेलीकॉम इंडस्ट्री में काम करने वाले कई कर्मचारियों की शिकायत है कि नेटवर्क मेंटेनेंस, कस्टमर सपोर्ट और तकनीकी दिक्कतों को तुरंत सुलझाने के दबाव में उन्हें लगभग 24 घंटे ऑन-कॉल रहना पड़ता है। रात-दिन का फर्क मिट जाने से न तो ठीक से नींद पूरी हो पाती है, न ही परिवार के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। लगातार स्क्रीन के सामने रहने और नींद पूरी न होने का सीधा असर कर्मचारियों की सेहत और मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है।

नए लेबर कोड 2026 में क्या है प्रावधान?
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 से देशभर में चार नए लेबर कोड लागू किए हैं, जिनमें 44 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर व्यवस्था को सरल बनाया गया है। इन नियमों के तहत दैनिक 8 घंटे और साप्ताहिक 48 घंटे काम का मानक तय किया गया है।
8 घंटे ड्यूटी, डबल ओवरटाइम पेमेंट का नियम
नए नियमों के मुताबिक अगर किसी कर्मचारी से तय सीमा से ज्यादा काम कराया जाता है, तो नियोक्ता को उसे डबल ओवरटाइम भुगतान करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा IT सेक्टर के कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड मोड को भी आधिकारिक मान्यता दी गई है, ताकि रोजाना की यात्रा और समय की बर्बादी कम हो सके। हालांकि जमीनी स्तर पर इन नियमों का कितना सख्ती से पालन हो रहा है, यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
कोर्ट भी उठा चुके हैं सवाल
अत्यधिक काम के दबाव और कार्यस्थल के माहौल को लेकर सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट दोनों ही अपनी चिंता जता चुके हैं। अदालतों ने कहा है कि जरूरत से ज्यादा काम कराना और कार्यस्थल पर विषाक्त माहौल बनाना एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है, जिसके लिए ठोस नीतियां बनाई जानी चाहिए। कोर्ट के मुताबिक अत्यधिक कार्यभार का सीधा असर कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वर्क लाइफ बैलेंस टूटने का असर – सेहत और परिवार दोनों पर
मनोचिकित्सकों के मुताबिक लगातार बढ़ता कार्यभार और वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी युवाओं में मानसिक तनाव और थकान का बड़ा कारण बनती जा रही है। नींद पूरी न होने से शरीर और दिमाग दोनों पर बुरा असर पड़ता है, जबकि परिवार को समय न दे पाने से रिश्तों में भी दूरियां बढ़ने लगती हैं। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर यह डिप्रेशन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण भी बन सकती है।
व्यवस्था कैसे सुधरेगी, कौन सुधारेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान सिर्फ कानून बनाने से नहीं, बल्कि उनके सख्त क्रियान्वयन से होगा। इसके लिए तीन स्तर पर काम करना जरूरी है – सरकार को नए लेबर कोड के प्रावधानों का जमीनी स्तर पर पालन सुनिश्चित करना होगा, कंपनियों को न्यूनतम वेतन बढ़ाकर और उचित स्टाफिंग करके कर्मचारियों पर दबाव कम करना होगा, और कर्मचारियों को भी संगठित होकर अपने अधिकारों की मांग उठानी होगी। जब तक इन तीनों स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक सिर्फ कागजों पर बने कानून जमीनी हकीकत नहीं बदल पाएंगे।
महंगाई और श्रम कानूनों से जुड़ी अन्य रिपोर्ट्स आप India Daily और वर्कप्लेस मानसिक स्वास्थ्य पर विस्तृत जानकारी ORF Hindi पर पढ़ सकते हैं।
सरकारी नौकरी बनी बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस का विकल्प
प्राइवेट सेक्टर में बढ़ते कार्यभार को देखते हुए बड़ी संख्या में युवा अब सरकारी नौकरियों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां तय काम के घंटे और बेहतर सामाजिक सुरक्षा मिलती है। ऐसे में इच्छुक उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने राज्य के रोजगार विभाग और सरकारी नौकरी पोर्टल्स पर नियमित नजर बनाए रखें, ताकि आने वाली भर्तियों की जानकारी समय पर मिल सके।
Leave a Reply