(प्रतीकात्मक तस्वीर)
vote chori election commission Gyanesh Kumar देश की राजनीति इन दिनों “वोट चोरी” के मुद्दे पर गरमाई हुई है। विपक्ष लगातार चुनाव आयोग और खासतौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूचियों में गड़बड़ी के आरोप लगा रहा है, जबकि सत्ताधारी पार्टी और चुनाव आयोग इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। आइए समझते हैं यह पूरा विवाद है क्या और अब तक इसमें क्या-क्या हुआ है।
विवाद की जड़ में है क्या?
यह पूरा विवाद मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) से जुड़ा है, जिसके तहत बीते करीब एक साल से मतदाता सूचियों को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम बिना उचित सत्यापन और प्रक्रिया के सूची से हटा दिए गए, जिससे चुनावी निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने दी विवाद को नई हवा
बीते हफ्ते इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने बीते करीब 10 महीनों में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को लेकर चिंता जताई थी। हालांकि चुनाव आयोग ने इसे संस्थागत विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया बताते हुए कहा है कि आयोग के सभी अंतिम फैसले हमेशा सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं।
विपक्ष का हमला तेज, राहुल गांधी भी मुखर
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लंबे समय से “वोट चोरी” का आरोप लगाते आए हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उन्होंने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर दी। कांग्रेस पार्टी ने देशभर में राज्य चुनाव कार्यालयों पर प्रदर्शन मार्च निकालने का ऐलान किया, जिसमें ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी, उन्हें पद से हटाने और मतदाता सूची में हुए बदलावों की स्वतंत्र जांच की मांग रखी गई। इसी क्रम में लखनऊ, शिमला समेत कई शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुरजोर प्रदर्शन भी किए, जिसके दौरान कुछ जगहों पर पुलिस से झड़प और नेताओं की हिरासत की भी खबरें आईं।
युवा संगठन CJP भी मैदान में उतरा
इस विवाद में सोशल मीडिया आधारित युवा आंदोलन Cockroach Janta Party (CJP) भी कूद पड़ा है। CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने ज्ञानेश कुमार को “भारत के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा” करार देते हुए उन्हें इस्तीफे के लिए समय-सीमा दी और ऐलान किया कि अगर वे तय समय में पद नहीं छोड़ते, तो 2 अक्टूबर से मुंबई से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।
सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने पक्षपात के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय रखना एक सामान्य और वैध लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी गड़बड़ी का संकेत। वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष पर चुनाव आयोग के खिलाफ जानबूझकर बदनामी अभियान चलाने का आरोप लगाया है और कहा है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।
आगे क्या होने की संभावना है
फिलहाल यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। एक तरफ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल देशव्यापी आंदोलन की तैयारी में हैं, तो दूसरी तरफ CJP जैसे युवा संगठन भी अपने स्तर पर दबाव बनाने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग और सरकार इन आरोपों पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या मामला किसी न्यायिक या स्वतंत्र जांच तक पहुंचता है।
निष्कर्ष
“वोट चोरी” का यह विवाद अब सिर्फ विपक्ष बनाम सरकार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें युवा संगठनों की एंट्री ने इसे और व्यापक बना दिया है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और मतदाता सूचियों की पारदर्शिता को लेकर उठे यह सवाल आने वाले चुनावों से पहले देश की सियासत में अहम मुद्दा बने रहने की संभावना है।
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