क्या स्कूल में बच्चों को धार्मिक यात्रा में शामिल करना सही है? Barotha की Sanskar Academy पर उठे सवाल

🔄 19 August 2026 ⏱ 1 मिनट में पढ़ें 👁 145 views
क्या स्कूल में बच्चों को धार्मिक यात्रा में शामिल करना सही है? Barotha की Sanskar Academy पर उठे सवाल

क्या स्कूल में बच्चों को धार्मिक यात्रा में शामिल करना सही है? Barotha की Sanskar Academy पर उठे सवाल

Barotha से सामने आई तस्वीरों ने स्कूलों में शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों की सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है।

Barotha में Sanskar Academy के बच्चों की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें छोटे बच्चे सड़क पर कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजन में शामिल दिखाई दे रहे हैं। तस्वीरों में बच्चे कांवड़ से जुड़े सामान लेकर यात्रा में चलते नजर आ रहे हैं।

यह दृश्य देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या स्कूल का काम बच्चों को धार्मिक आयोजन में शामिल करना होना चाहिए, या स्कूल को सभी धर्मों के बच्चों के लिए समान और निष्पक्ष शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए?

स्कूल और धर्म के बीच संतुलन कितना जरूरी?

भारत एक बहुधार्मिक और विविधता वाला देश है। बच्चों को भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों के बारे में जानकारी देना शिक्षा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब किसी धार्मिक गतिविधि में विद्यार्थियों की प्रत्यक्ष भागीदारी कराई जाती है, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि इसमें बच्चे और उनके माता-पिता की सहमति है या नहीं, और क्या किसी बच्चे पर किसी धार्मिक गतिविधि में शामिल होने का दबाव तो नहीं है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 28 धार्मिक instruction और धार्मिक worship में भागीदारी के संबंध में महत्वपूर्ण सुरक्षा देता है। राज्य से पूरी तरह संचालित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। वहीं राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त संस्थानों में किसी विद्यार्थी को धार्मिक शिक्षा या पूजा में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जब तक नाबालिग के मामले में उसके अभिभावक की सहमति न हो।

इसलिए किसी स्कूल की गतिविधि को केवल तस्वीर देखकर तुरंत गैरकानूनी घोषित करना उचित नहीं होगा। इसके लिए स्कूल का बोर्ड/प्रबंधन, उसकी affiliation, कार्यक्रम का उद्देश्य, बच्चों की भागीदारी की प्रकृति और अभिभावकों की अनुमति जैसी पूरी जानकारी जरूरी है।

बच्चों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण

तस्वीरों में बच्चे सड़क पर समूह के साथ चलते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे किसी भी सार्वजनिक जुलूस या यात्रा में स्कूल की पहली जिम्मेदारी बच्चों की सुरक्षा, निगरानी और स्वास्थ्य होनी चाहिए।

बारिश, सड़क पर ट्रैफिक, भीड़ और लंबे समय तक पैदल चलने जैसी परिस्थितियों में छोटे बच्चों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है। बच्चों को किसी भी बाहरी कार्यक्रम में ले जाने से पहले पर्याप्त शिक्षक/स्टाफ निगरानी, अभिभावकों की जानकारी और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था होना महत्वपूर्ण है।

RTE Act में बच्चों के शिक्षा के अधिकार और स्कूलों की जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न से सुरक्षा का प्रावधान भी है।

क्या धार्मिक संस्कृति के बारे में पढ़ाना गलत है?

नहीं।

बच्चों को भारत की संस्कृति, त्योहारों, परंपराओं और अलग-अलग धर्मों के बारे में पढ़ाना अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि सही तरीके से किया जाए तो इससे बच्चों में सहिष्णुता, विविधता और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान विकसित हो सकता है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में भी सहिष्णुता, विविधता, बहुलता, समानता, न्याय, करुणा और सभी लोगों के सम्मान जैसे मूल्यों को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

लेकिन अंतर यह है कि धर्म के बारे में शिक्षा देना और बच्चों को किसी धार्मिक गतिविधि में अनिवार्य रूप से शामिल करना दो अलग बातें हैं।

स्कूल को क्या करना चाहिए?

किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्कूल को कुछ स्पष्ट बातों का ध्यान रखना चाहिए—

– बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

– अभिभावकों को कार्यक्रम की पूरी जानकारी दी जाए।

– धार्मिक गतिविधि में भागीदारी को लेकर स्पष्ट सहमति ली जाए, जहाँ आवश्यक हो।

– किसी बच्चे को धर्म के आधार पर अलग महसूस न कराया जाए।

– किसी विद्यार्थी पर धार्मिक गतिविधि में शामिल होने का दबाव न हो।

– स्कूल का वातावरण सभी धर्मों और विचारों का सम्मान करने वाला हो।

– धार्मिक आयोजन को शिक्षा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संदर्भ में समझाया जाए, न कि किसी एक धार्मिक पहचान को बच्चों पर थोपने के रूप में।

CBSE से संबद्ध स्कूलों के लिए बोर्ड के affiliation bye-laws में भी प्रवेश में धर्म, जाति, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव न करने और निर्धारित curriculum का पालन करने की शर्तें हैं।

Sanskar Academy से पूछे जाने चाहिए ये सवाल

इन तस्वीरों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय स्कूल प्रबंधन से कुछ सीधे सवाल पूछे जा सकते हैं:

क्या यह कार्यक्रम स्कूल द्वारा आयोजित था?

क्या बच्चों के अभिभावकों से पूर्व अनुमति ली गई थी?

क्या कांवड़ यात्रा में शामिल होना बच्चों के लिए स्वैच्छिक था?

बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल ने क्या व्यवस्था की थी?

क्या सभी विद्यार्थियों को समान विकल्प दिया गया था?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह केवल सांस्कृतिक/सामुदायिक गतिविधि थी या विद्यार्थियों को धार्मिक गतिविधि में अनिवार्य रूप से शामिल किया गया था।

संविधान के अनुच्छेद 28 में धार्मिक शिक्षा को लेकर दिए गए प्रावधानों को विस्तार से यहां पढ़ें, वहीं शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act) 2009 का पूरा मूल पाठ भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर देखा जा सकता है। धार्मिक आयोजनों से जुड़े एक अन्य विवाद के लिए पंडित प्रदीप मिश्रा विवाद की खबर पढ़ें, और कांवड़ यात्रा से जुड़ी ताज़ा अपडेट के लिए हमारी अमरनाथ यात्रा 2026 रिपोर्ट देखें।

निष्कर्ष

स्कूल केवल किताबें पढ़ाने की जगह नहीं है; वह बच्चों के सोचने और समाज को समझने की नींव भी तैयार करता है। इसलिए स्कूलों को धर्म के प्रति सम्मान और धार्मिक निष्पक्षता—दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए।

किसी धार्मिक परंपरा का सम्मान करना गलत नहीं है, लेकिन स्कूल में पढ़ने वाले हर बच्चे की अपनी पारिवारिक और धार्मिक पृष्ठभूमि हो सकती है। इसलिए किसी भी धार्मिक गतिविधि में बच्चों की भागीदारी स्वैच्छिक, पारदर्शी, अभिभावकों की जानकारी/सहमति के अनुरूप और पूरी तरह सुरक्षित होनी चाहिए।

Barotha की Sanskar Academy की इन तस्वीरों ने इसी महत्वपूर्ण सवाल को सामने ला दिया है—स्कूल बच्चों को संस्कृति और परंपराओं से जोड़ते हुए उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कैसे करे?

यह सवाल किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि हर बच्चे के शिक्षा के अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान का सवाल है।

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updatetimesin
Update Times के वरिष्ठ पत्रकार।
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