क्या है सपिंड विवाह जिसमे हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार, किस्से शादी नहीं कर सकते जाने।

🔄 15 June 2024 ⏱ 1 मिनट में पढ़ें 👁 101 views
क्या है सपिंड विवाह  जिसमे हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार, किस्से शादी नहीं कर सकते जाने।

हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार, एक व्यक्ति अपनी मां की तरफ से तीन पीढ़ियों तक, यानी भाई-बहन, मां-बाप, दादा-दादी तक, किसी से विवाह नहीं कर सकता है। इस प्रतिबंध को पिता की तरफ से पांच पीढ़ियों तक लागू किया गया है। इसमें उन दूर के पूर्वजों के साथ शादी करने की रोकथाम शामिल है ताकि करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी से आनेवाली शारीरिक और मानसिक समस्याएं आ सकने से बचा जा सके।

क्या है सपिंड विवाह,जिसमे हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार,kitni pidi tak shadi nahi kar sakte,किस्से शादी नहीं कर सकते जाने।

पहले जानिए हिंदू मैरिज एक्ट का प्रावधान।

हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 5(V) द्वारा हिंदू धर्म के अनुयायियों को आपसी रिश्तों में निकटता के कारण विवाह से रोका जाता है। यदि वे सपिंड हैं, तब तक कि ऐसा कोई प्रथा या रिवाज उनके समुदाय में नहीं है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 3(f)(ii) के तहत, यदि दो व्यक्तियों के पूर्वज एक ही हैं, तो उनका विवाह ‘सपिंड विवाह’ कहलाएगा।

एक घटना 1998 की है, जब एक महिला ने अपने पिता के कजिन भाई के बेटे से शादी की थी। इस मामले में, पति ने 2007 में सुधार सुनिश्चित किया कि उनकी शादी सपिंड विवाह थी, और महिला के समुदाय में ऐसी शादियां नहीं होतीं। अमान्यता की घोषणा के बाद, महिला ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन कोर्ट ने इसे मान्यता नहीं दी।

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सपिंड विवाह उन रिश्तों को सूचित करता है जो आपस में बहुत करीबी रिश्तेदारों के बीच होते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट में, इसे सपिंड कहा जाता है। इन रिश्तों को तय करने के लिए धारा 3 में नियम दिए गए हैं। धारा 3(f)(ii) के तहत, अगर दो व्यक्तियों के पूर्वज एक ही हैं और उनका रिश्ता सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आता है, तो वे दोनों सपिंड विवाह में होते हैं।

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Sapinda Vivah’

क शब्द है जिसका उपयोग किसी विशेष समूह के रिश्तेदारों के बीच की शादियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। हिन्दू परंपरा के अनुसार, उन व्यक्तियों के बीच जो पिता की ओर से तीन पीढ़ियों और मां की ओर से पाँच पीढ़ियों तक के समय के अंदर साझा एक सम्मान करने वाले वंशज होते हैं, उनकी शादियाँ ‘सपिंड’ कहलाती हैं। इस अवधारणा का उद्देश्य ऐसी संबंधों को रोकना है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं।

हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने एक मामले को लेकर, कोर्ट ने ‘सपिंड विवाह’ की मान्यता को खारिज किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शादी शायद ‘सपिंड’ प्रतिबंधों के अनुसार निषिद्ध संबंधों के भीतर हो सकती थी। कोर्ट का निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि शादी करने वाले व्यक्तियों की भलाइयों का ध्यान रखा जा रहा है।

भारतीय संविधान ने बुनियादी अधिकार प्रदान किए हैं, जिसमें शादी का हक शामिल है और जिसमें जाति, धर्म, या किसी अन्य कारक के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। हालांकि, भारतीय समाज में ‘सपिंड’ अवधारणा के अंतर्गत कुछ रिश्तों को प्रतिबंधित किया गया है, जिससे आपसी सम्बंधों से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं का सामना करने का प्रयास किया जा रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट के हाल के कानूनी प्रवृत्ति ने देश में ‘सपिंड’ विवाहों के चर्चा और विचारों पर प्रकाश डाला है।

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updatetimesin
Update Times के वरिष्ठ पत्रकार।
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