CJP Protest Jantar Mantar जंतर मंतर पर चल रहे CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के प्रदर्शन और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि इस मुद्दे को बड़े मीडिया घरानों और सरकार की तरफ से कितनी गंभीरता से लिया गया है। इस रिपोर्ट में हम तथ्यों की पड़ताल करते हैं।
क्या वाकई मीडिया इस मुद्दे पर चुप है?
सोशल मीडिया पर यह धारणा फैली है कि किसी बड़े मीडिया संस्थान ने इस प्रदर्शन को कवर नहीं किया। लेकिन तथ्य इससे अलग तस्वीर दिखाते हैं। ThePrint लगातार लाइव अपडेट्स दे रहा है, वहीं Al Jazeera, BBC, Deccan Herald और The Tribune जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों ने भी वांगचुक की भूख हड़ताल, उनकी गिरफ्तारी और अस्पताल में भर्ती किए जाने की खबरें प्रकाशित की हैं। इसलिए यह कहना कि मीडिया पूरी तरह खामोश है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। लेकिन एक फर्क साफ नजर आता है — अंग्रेजी और डिजिटल मीडिया (जैसे ऊपर गिनाए गए प्रकाशन) इस मुद्दे को लगातार, गहराई से और लाइव-अपडेट फॉर्मेट में कवर कर रहे हैं, जबकि हिंदी न्यूज चैनलों के प्राइम-टाइम बुलेटिन में इसे उतनी जगह और तवज्जो नहीं मिली, जितनी प्रदर्शनकारी और समर्थक उम्मीद कर रहे थे। यह कोई नई बात नहीं है — भारत में अक्सर देखा गया है कि छात्र-आंदोलन, नागरिक अधिकार या सरकार-विरोधी प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर अंग्रेजी/डिजिटल आउटलेट्स और हिंदी टीवी प्राइम-टाइम की कवरेज में अंतर रहता है। हम किसी एक चैनल का नाम लेकर आरोप नहीं लगा रहे, क्योंकि इसका कोई सत्यापित डेटा (जैसे स्क्रीन-टाइम एनालिसिस) फिलहाल उपलब्ध नहीं है — लेकिन यह पैटर्न पाठकों और मीडिया विश्लेषकों द्वारा बार-बार नोट किया गया है।

प्रधानमंत्री की तरफ से अब तक क्या रुख रहा है?
CJP Protest Jantar Mantar अब तक उपलब्ध रिपोर्ट्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस ताज़ा ‘संसद चलो’ मार्च और वांगचुक की मौजूदा भूख हड़ताल को लेकर कोई सीधा, आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि यह पहली बार नहीं है — इससे पहले लद्दाख से जुड़े आंदोलनों के दौरान गृह मंत्रालय (MHA) की ओर से बयान जारी किए जा चुके हैं। मौजूदा मुद्दे पर सरकार की तरफ से चुप्पी को कुछ लोग रणनीतिक ठहराव मानते हैं, तो कुछ इसे टालने की कोशिश बताते हैं। दोनों ही व्याख्याएं फिलहाल अटकलें हैं, ठोस सबूत नहीं।
वांगचुक को जंतर मंतर से हटाना: संविधान और कानून की नज़र से
यह सवाल कि पुलिस की कार्रवाई कानूनी रूप से कितनी सही थी, दो पहलुओं से देखा जाना चाहिए।
सरकार और पुलिस का पक्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सफदरजंग अस्पताल से उनकी तुरंत रिहाई की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वांगचुक हिरासत में नहीं हैं और उन्हें जांच व चिकित्सा प्रक्रिया में सहयोग करना चाहिए। दिल्ली पुलिस का तर्क है कि जंतर मंतर पर धरना देने के लिए तय समय-सीमा और अनुमति की शर्तें होती हैं, और मार्च को ‘अनधिकृत जुलूस’ मानते हुए भीड़ को नियंत्रित करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन का संवैधानिक अधिकार है। अनुच्छेद 19(1)(ख) के तहत शांतिपूर्ण सभा का अधिकार है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन भी है — यही आधार बनाकर प्रशासन अपने कदम को सही ठहराता है।
वांगचुक पक्ष और आलोचकों की दलील
दूसरी ओर, गीतांजलि आंग्मो और समर्थकों का आरोप है कि वांगचुक को जबरन हटाया गया और यह उनकी ‘अवैध हिरासत’ के बराबर है। उनका कहना है कि एक शांतिपूर्ण भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को हटाना, अभिव्यक्ति और विरोध के मौलिक अधिकार पर सीधा हस्तक्षेप है। यह पक्ष यह भी सवाल उठाता है कि यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, तो सुरक्षा के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में बल और बैरिकेडिंग की जरूरत क्यों पड़ी।
निष्कर्ष
कानूनी तौर पर देखा जाए तो प्रशासन के पास शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए संवैधानिक अधिकार मौजूद है, और अदालत ने भी फिलहाल पुलिस की कार्रवाई पर सवाल नहीं उठाया है। लेकिन यह मामला अभी अदालत में है और गीतांजलि आंग्मो की चुनौती लंबित है, इसलिए अंतिम फैसला आना बाकी है। जहां तक मीडिया और सरकार की ‘चुप्पी’ की बात है, तथ्य बताते हैं कि कवरेज पूरी तरह गायब नहीं है, बल्कि उतनी प्रमुखता से नहीं है जितनी प्रदर्शनकारी चाहते हैं — और यह फर्क समझना जरूरी है। CJP Protest Jantar Mantar
यह एक विकसित हो रही खबर है, आगे की जानकारी के लिए अपडेट टाइम्स के साथ बने रहें।
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