2029 के आम चुनाव (जिसे आमतौर पर लोग ‘2028 चुनाव’ भी कहते हैं) से पहले मोदी सरकार को लेकर देश-विदेश की कई एजेंसियों के सर्वे सामने आ रहे हैं। इन सर्वों में जहां एक तरफ पीएम मोदी की लोकप्रियता को लेकर आंकड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर आलोचना भी हो रही है। आइए दोनों पक्षों को विस्तार से समझते हैं।
पीएम मोदी की लोकप्रियता को लेकर सर्वे क्या कहते हैं?
अमेरिकी डेटा एनालिटिक्स फर्म मॉर्निंग कंसल्ट के मार्च 2026 के सर्वे के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 68 प्रतिशत अप्रूवल रेटिंग के साथ दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेताओं की सूची में लगातार टॉप पर बने हुए हैं। यह रेटिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (39 प्रतिशत), ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर (24 प्रतिशत) और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (17 प्रतिशत) से काफी अधिक है।
हालांकि फरवरी 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा जनवरी 2025 के 75 प्रतिशत से थोड़ा कम हुआ है। इसके अलावा Ipsos IndiaBus सर्वे में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच अप्रूवल रेटिंग में करीब 54 प्रतिशत अंकों का बड़ा क्षेत्रीय अंतर भी सामने आया है, जो देश में राजनीतिक धारणा के बंटवारे को दिखाता है।
सरकार का पक्ष: आर्थिक मोर्चे पर उपलब्धियां
जनवरी 2026 में पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण (इकोनॉमिक सर्वे 2025-26) के अनुसार भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत अनुमानित है, जिससे भारत लगातार चौथे साल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। सर्वेक्षण के मुताबिक अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच औसत महंगाई दर घटकर सिर्फ 1.7 प्रतिशत रह गई, जो CPI इंडेक्स शुरू होने के बाद से सबसे कम है। सरकार इसका श्रेय मजबूत निजी खपत, लगातार सार्वजनिक पूंजीगत खर्च और खाद्य-ईंधन कीमतों में गिरावट को देती है।
विपक्ष और आलोचकों का पक्ष: बेरोजगारी और औद्योगिक चुनौतियां
दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ‘मेक इन इंडिया’ और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाएं अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाई हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से अब तक विनिर्माण क्षेत्र की औसत वृद्धि दर सिर्फ 6 प्रतिशत रही, जबकि लक्ष्य 12-14 प्रतिशत था। इसके अलावा विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों का हिस्सा भी 2011-12 के 12.6 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 11.4 प्रतिशत रह गया।
स्वतंत्र आर्थिक आंकड़ों के अनुसार भी बेरोजगारी दर में हाल में उतार-चढ़ाव देखा गया है। मासिक आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 में बेरोजगारी दर बढ़कर 5.5 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में यह 4.9 प्रतिशत के निचले स्तर पर थी। विशेषज्ञों का कहना है कि खासतौर पर शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है, जो नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है।
निष्कर्ष: मिला-जुला आकलन
कुल मिलाकर विभिन्न सर्वे और रिपोर्ट्स से एक मिला-जुला तस्वीर सामने आती है। एक तरफ पीएम मोदी की वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता और मैक्रो-इकोनॉमिक आंकड़े (जीडीपी ग्रोथ, कम महंगाई) सरकार के पक्ष में जाते नजर आते हैं, तो दूसरी तरफ बेरोजगारी, विनिर्माण क्षेत्र की धीमी रफ्तार और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दे आलोचकों के तर्कों को मजबूती देते हैं। 2029 के आम चुनाव में इनमें से कौन सा पक्ष हावी रहेगा, यह आने वाले समय में जनता की प्राथमिकताओं और आर्थिक हालात पर निर्भर करेगा। किसी भी चुनाव परिणाम का सटीक पूर्वानुमान लगाना अभी संभव नहीं है।
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
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