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Bangladesh Army Rule: बांग्लादेश में सैन्य शासन लागू शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू

Bangladesh Army Rule

Bangladesh Army Rule: बांग्लादेश में सैन्य शासन लागू शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू

Bangladesh Army Rule: बांग्लादेश में सेना का शासन कोई नई बात नहीं है। इस देश में पहले भी कई बार सैन्य शासन का अनुभव हो चुका है। जब बांग्लादेश में सेना सत्ता में होती है, तो प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति के बजाय, सेना प्रमुख या सैन्य नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण फैसले लेते हैं।

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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हाल ही में इस्तीफा देने के बाद देश छोड़ दिया है। अब बांग्लादेश की कमान सेना के हाथों में है, और इस स्थिति के बाद सोशल मीडिया पर कई सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश में सेना का शासन कोई नई बात नहीं है। इस देश में पहले भी कई बार सैन्य शासन का अनुभव हो चुका है।

मुख्य सवाल यह है कि

  1. सेना का कौन सा अधिकारी अब देश की महत्वपूर्ण नीतियों और फैसलों को संभालेगा?
    • सैन्य प्रमुख: आमतौर पर, जब सेना सत्ता में होती है, तो सेना के प्रमुख या जनरल बड़े निर्णय लेते हैं। बांग्लादेश में सैन्य शासन के दौरान, यह संभावना है कि सेना का प्रमुख या सर्वोच्च सैन्य अधिकारी प्रमुख भूमिका निभाएगा।
  2. क्या शेख हसीना भारत आएंगी या लंदन जाएंगी?
    • भारत और लंदन की अफवाहें: कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शेख हसीना भारत आ सकती हैं, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि वह भारत के रास्ते लंदन जा सकती हैं। यह स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है और इसकी पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
  3. सैन्य शासन के तहत बांग्लादेश की स्थिति पर प्रभाव:
    • सैन्य निर्णय: सैन्य शासन के दौरान, नागरिक प्रशासन की भूमिका अक्सर सीमित हो जाती है और प्रमुख नीतिगत फैसले सैन्य नेतृत्व द्वारा किए जाते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि देश की आंतरिक और बाहरी नीतियां सैन्य अधिकारियों के हाथ में होंगी।

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कौन लेगा फैसला

बांग्लादेश में यह पहली बार नहीं है जब सेना के हाथों में देश की कमान आई हो। इससे पहले भी कई बार सैन्य शासन का अनुभव हो चुका है। वर्तमान स्थिति में, जब बांग्लादेश में सेना का शासन लागू है,

सैन्य शासन के दौरान:

  • सभी प्रमुख निर्णय: सेना के शासन के दौरान, प्रधानमंत्री के पद पर किसी भी व्यक्ति की भूमिका सीमित हो जाती है। सभी महत्वपूर्ण निर्णय और नीतिगत फैसले सेना प्रमुख द्वारा लिए जाते हैं।
  • वर्तमान सेना प्रमुख: इस समय बांग्लादेश की सेना के प्रमुख आर्मी चीफ वक़ारुज़्ज़मान हैं। उनके नेतृत्व में ही देश की सभी महत्वपूर्ण नीतियां और निर्णय संचालित होंगे।

इसका मतलब है कि जब तक बांग्लादेश में सेना का शासन रहेगा, वक़ारुज़्ज़मान ही प्रमुख नीति निर्धारक होंगे और देश के सभी अहम फैसले उनकी अगुवाई में लिए जाएंगे। यह स्थिति बांग्लादेश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती है, और इससे देश के आंतरिक और बाहरी मामलों की दिशा तय होगी।

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पहले भी हुआ सेना पलट

बांग्लादेश के इतिहास में सेना और सत्ता के बीच संघर्ष कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई बार ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं।

1975 में सेना का सत्ता पर कब्जा:

  • इतिहासिक संदर्भ: 1975 में बांग्लादेश की सत्ता पर सेना ने कब्जा कर लिया था। उस समय बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान थे, जो कि शेख हसीना के पिता थे।
  • सैन्य शासन: शेख मुजीबुर्रहमान की सरकार के पतन के बाद, सेना ने सत्ता पर नियंत्रण प्राप्त किया। इस सैन्य शासन की अवधि लगभग 15 वर्षों तक चली। इस दौरान, बांग्लादेश की राजनीति और प्रशासन में सेना की प्रमुख भूमिका थी और नागरिक प्रशासन की शक्ति काफी हद तक सीमित हो गई थी।
  • आगे की दिशा: यह सैन्य शासन बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डालने वाला था।

सैन्य और सत्ता की पुनरावृत्ति:

  • बांग्लादेश के इतिहास में इस प्रकार के सैन्य हस्तक्षेप और सत्ता संघर्ष का पुनरावृत्ति एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जो देश की राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और प्रशासनिक संरचना को प्रभावित करता है।

इस प्रकार, बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति, जिसमें सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है, उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जुड़ी हुई है। यह संदर्भ यह दर्शाता है कि बांग्लादेश में सैन्य शासन का एक लंबा और जटिल इतिहास रहा है।

बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण खत्म

हाल ही में, बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण नीति को समाप्त कर दिया, जिससे देश में बड़ा राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया।

  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सार्वजनिक विरोध: सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, बांग्लादेश की जनता सड़कों पर उतर आई और सरकार पर दबाव डालने की कोशिश की कि आरक्षण को फिर से बहाल किया जाए।
  • सरकारी प्रतिक्रिया: हालांकि जनता के भारी विरोध और दबाव के बावजूद, सरकार ने आरक्षण को पुनः लागू करने के निर्णय को स्वीकार नहीं किया।
  • चुनाव और विपक्ष का बॉयकॉट: इस विवादित स्थिति के चलते, बांग्लादेश में चुनाव हुए और विपक्षी पार्टियों ने चुनाव का बॉयकॉट किया।
  • सेना की संभावित भूमिका: चुनावों के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता और विपक्ष का बॉयकॉट यह संकेत देने लगा कि बांग्लादेश में सेना सत्ता पर कब्जा कर सकती है।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण संबंधी फैसले, सरकार की अस्वीकार्यता, और विपक्षी पार्टियों का चुनाव बॉयकॉट बांग्लादेश में सेना की सत्ता में हस्तक्षेप की संभावना को बढ़ा रहे हैं।

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